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कागज पर ढल आई है मेरे अक्स की स्याही, कुछ और नहीं मैं बस एक रचना ही तो हूँ if u want to see the poems of my blog, please click at the link of old posts at the end of the each page
Sunday, February 26
Thursday, October 25
हम सब भारतीय है
हम सब भारतीय है जो मंदिर न जाने वालो को नास्तिक बताते हैं,
और खुद मंदिर मैं जा कर पड़ोसन और पडोसी की चुगली लगते है ,
हम सब भारतीय हैं,जो भगवा पहन कर सनयासिनो से इश्क लड़ाते है ,
और डिस्को जाने वालो हमारे युवको को पथभ्रष्ट बताते है !
हम सब भारतीय है ,जो पत्नी के घूमने पर पाबंदी लगते है,
मगर उसके के तीन दिन के तीर्थ के झूठ पर जल्दी स्वीकृति लगते है ,
हम सब भारतीय है, जो अपने बच्चो के पास होने के लिए नक़ल लगवाते है ,
और फेल हो जाये तो पडोसी से भी छुपाते है ,
हम सब झूठ के इतने आदि हो चुके है,
की सच से सदा घबराते है,
राम नाम मैं नहीं कर्म में निवास करता है,
ये बात हमें गंदे कर्मो में लिप्त लोग ही उपदेश बना के सुनाते है!
और खुद मंदिर मैं जा कर पड़ोसन और पडोसी की चुगली लगते है ,
हम सब भारतीय हैं,जो भगवा पहन कर सनयासिनो से इश्क लड़ाते है ,
और डिस्को जाने वालो हमारे युवको को पथभ्रष्ट बताते है !
हम सब भारतीय है ,जो पत्नी के घूमने पर पाबंदी लगते है,
मगर उसके के तीन दिन के तीर्थ के झूठ पर जल्दी स्वीकृति लगते है ,
हम सब भारतीय है, जो अपने बच्चो के पास होने के लिए नक़ल लगवाते है ,
और फेल हो जाये तो पडोसी से भी छुपाते है ,
हम सब झूठ के इतने आदि हो चुके है,
की सच से सदा घबराते है,
राम नाम मैं नहीं कर्म में निवास करता है,
ये बात हमें गंदे कर्मो में लिप्त लोग ही उपदेश बना के सुनाते है!
ए दिन तूने क्यों आंखे मीच ली मुझे देख
मैं कई बार सोचती हूँ की मजबूरियां इंसान को मजबूर कर देती है , की उसे दिन
की बजाय रात अनोखी लगती है,शैतान आज भी भगवन से ज्यादा ताकत वर है, क्युकी
वो लोगो को वो सुख सुविधा देता है जो भगवान नहीं दे सकता , अगर ये सृष्टि
प्रभु ने बनायीं है तो उसने सुख सुविधा का मोह भी इंसान में पैदा किया है!
वो जीता है रात की रंगीनियों मैं मगर उसके अन्दर का अहसास उसे बार बार याद
दिलाता है और कचोटता ह की दिन तुझसे आंख नहीं मिलाता , इसलिए हर आदमी
दिन से ये ही सवाल करता है :
ए दिन तूने क्यों आंखे मीच ली मुझे देख कर,
रात खुशनुमा थी तो तुझे क्यों दुःख है?
तू बड़े दावे करता है दूसरो को रौशनी देने के,
जब रात तुझसे हसीं है तो जलता क्यों है ?
जब मेरे घर मैं भूख थी और गरीबी थी ,
तू क्यों तूने मेरे फटे वस्त्रो को उजागर किया ?
जब रात ने ढक दिए मेरे दाग तो ,
अब मैं बन गया उसका पुजारी तो क्या ग़म है ?
तू बस नाम से है रोशन है , तेरी रौशनी आँखों में चुभती है,
रात को देख कितनी खूबसूरत जगमगाहट है ,
जब हजारो सितारे और चाँद शीतलता बिखेरे है
तो मुझे क्या दुःख है ?
बस तू तो एक झूठा अहसास है ,
वरना तेरा सूरज दिन भर जलता है,
तू जा दिन मुझे अब तेरी जरूरत नहीं,
मेरी रात रंगीन है, मुझे ये सुख है !
ए दिन तूने क्यों आंखे मीच ली मुझे देख कर,
रात खुशनुमा थी तो तुझे क्यों दुःख है?
तू बड़े दावे करता है दूसरो को रौशनी देने के,
जब रात तुझसे हसीं है तो जलता क्यों है ?
जब मेरे घर मैं भूख थी और गरीबी थी ,
तू क्यों तूने मेरे फटे वस्त्रो को उजागर किया ?
जब रात ने ढक दिए मेरे दाग तो ,
अब मैं बन गया उसका पुजारी तो क्या ग़म है ?
तू बस नाम से है रोशन है , तेरी रौशनी आँखों में चुभती है,
रात को देख कितनी खूबसूरत जगमगाहट है ,
जब हजारो सितारे और चाँद शीतलता बिखेरे है
तो मुझे क्या दुःख है ?
बस तू तो एक झूठा अहसास है ,
वरना तेरा सूरज दिन भर जलता है,
तू जा दिन मुझे अब तेरी जरूरत नहीं,
मेरी रात रंगीन है, मुझे ये सुख है !
अपने खुदा को खुदा कैसे कह दू?
अपने खुदा को खुदा कैसे कह दू?
क्युकी वो खुदा खुद को दिखलाता नहीं है ,
मैं तपती रेत पे चल रही हूँ,
क्यों वो मुझे कोई मरुद्यान दर्शाता नहीं है, हो सकता है की मंजिल दूर हो मगर ,
फिर भी कहीं एक हवा का झोंका भी तो चलाता नहीं है ,
क्या फिर उसकी खुदाई को समझूं?
लोग कहते है की वो अन्दर मेरे कहीं बसा है !
वो मेरे अक्स में भी तो नजर आता नहीं है !
कभी कभी दर्द हद से गुजर जाता है तो,
मेरे जख्मो को भी तो वो खुदा सहलाता नहीं है !!
क्युकी वो खुदा खुद को दिखलाता नहीं है ,
मैं तपती रेत पे चल रही हूँ,
क्यों वो मुझे कोई मरुद्यान दर्शाता नहीं है, हो सकता है की मंजिल दूर हो मगर ,
फिर भी कहीं एक हवा का झोंका भी तो चलाता नहीं है ,
क्या फिर उसकी खुदाई को समझूं?
लोग कहते है की वो अन्दर मेरे कहीं बसा है !
वो मेरे अक्स में भी तो नजर आता नहीं है !
कभी कभी दर्द हद से गुजर जाता है तो,
मेरे जख्मो को भी तो वो खुदा सहलाता नहीं है !!
किताबों में भी पढ़ी है ,
की वो आस पास रहता कहीं है ,
अगर वो आस पास है तो सांसो में समाता क्यों नहीं है ?
वो तो एक पहेली सा है ,
अजब उसका मेरा रिश्ता है ,
मैं मानती नहीं पर लोग कहते है ,
की उनको मेरी बातो में कहीं उस का नूर ,
नजर आता कहीं है !
मैं खुद को खुदा नहीं कहती मगर,
शायद वो मेरा मैं ही है तभी तो,
दूसरो को दिखता है मुझमे ,
और मुझे तो बस दूसरो में ही नजर आता वोही है !!
दिन पर दिn
दिन पर दिन बढता है पेड़ की तरह ,
फल दे न दे, तू पौधा है ,जिसे मैं खून से सींच रही हूँ,
फल दे न दे, तू पौधा है ,जिसे मैं खून से सींच रही हूँ,
मैं हर दिन रात तेरे बढ़ने की दुआ मांगती हूँ,
और अपनी साँसे दे कर तुझे मैं,खींच रही हूँ,
की आज नहीं तो कल कभी फल देगा,
न सही मैं, जो भी इसे खायेगा
एक पल तो आँख भर के मुझे याद करेगा ,
कहते है क़ुरबानी रंग लाती है ,
मुझे उस दिन का इंतजार रहेगा
जब भारत की हर महिला ,सशक्त बनेगी
मेरा स्वप्न उस दिन साकार बनेगा !!
Monday, April 23
Monday, April 16
two lines
jhakhm kha ke ji rahe hai, or rone pe bhi pabandi ha
hasne ki saja bhi , us sitamgar ne di hai
hasne ki saja bhi , us sitamgar ne di hai
Saturday, March 31
क्या हम नहीं कर रहे एक त्रिशंकु समाज का निर्माण?
क्या नेता, अभिनेता जो रोज रोज अपने साथी बदलते है, रोज नित नयी शादियाँ करते है, और हम उनकी खबरों को चटखारे लगा के पड़ते है, ये एक बहुत बड़े त्रिशंकु समाज की नींव रखने का आह्वान नहीं? कैसे हम अपने बच्चो और युवाओ को भटकने से रोक सकते हा? जब राखी का स्वयंवर जैसे प्रोग्राम हमारी संस्कृति का मजाक बनाते है? हर रोज नित नए बॉय फ्रेंड और गर्ल फ्रेंड बनाने वाले अभिनेताओ को सम्मान नहीं देते? जब हमारी ही कथनी और करनी में फर्क हा तो नव समाज का निर्माण कैसा होगा? ये है त्रिशंकु समाज , जो अपराध की जड़ो को सिंचित कर रहा hai
क्या नेता, अभिनेता जो रोज रोज अपने साथी बदलते है, रोज नित नयी शादियाँ करते है, और हम उनकी खबरों को चटखारे लगा के पड़ते है, ये एक बहुत बड़े त्रिशंकु समाज की नींव रखने का आह्वान नहीं? कैसे हम अपने बच्चो और युवाओ को भटकने से रोक सकते हा? जब राखी का स्वयंवर जैसे प्रोग्राम हमारी संस्कृति का मजाक बनाते है? हर रोज नित नए बॉय फ्रेंड और गर्ल फ्रेंड बनाने वाले अभिनेताओ को सम्मान नहीं देते? जब हमारी ही कथनी और करनी में फर्क हा तो नव समाज का निर्माण कैसा होगा? ये है त्रिशंकु समाज , जो अपराध की जड़ो को सिंचित कर रहा hai
Sunday, February 26
जर्रे जर्रे में मेरा दर्द बहा नदी की तरह ,
जर्रे जर्रे में मेरा दर्द बहा नदी की तरह ,
खून पानी बन गयाहै मेरा,
मैं हर रोज रोती हूँ किस्मत पे अपनी,
खून पानी बन गयाहै मेरा,
मैं हर रोज रोती हूँ किस्मत पे अपनी,
न चैन रात को है , न दिन को किसी भी तरह
एक अनचाहा सा रिश्ता खींच रही हूँ,
जिसमे बस दर्द बसा है केवल,
मगर मैं खींच रही हूँ उसे एक कुली की तरह
जो लोग मेरे अपने होने का दम भरते है,
वो भी बन गए है देखो अजनबी के तरह
न मर पा रही हूँ न मैं जी सकती हूँ ऐसे ,
जब हर दिन गिरता हो , बिजली की तरह
सारा दिन थक हार के जब मैं सोती हूँ,
बिस्तर लगता है कंटीली झाडी की तरह ,
ऐ रस्मो रिवाज की दुहाई देने वालो,
कभी तो अपना लो मुझे औलाद या बेटी की तरह,
मैं एक इंसान हूँ देवी नहीं
न इम्तेहान लो मेरा शिवजी की तरह
मैं खुदा नहीं हूँ की जहर पीलूंगी हर पल
कभी तो वो जहर उगलेगा ,ज्वालामुखी की तरह !
Wednesday, February 1
ऐ पथिक मुझे थकना नहीं है
ऐ पथिक मुझे थकना नहीं है, मैं थक गयी तो कैसे मंजिल पाऊंगी ?
मैं सो नहीं पाती रात दिन,ये बीमारी नहीं कोई बस मेरी आँखों के है स्वप्न ,
क्युकी ये मुझे सोने नहीं देते हैं, हर वक्त तड़पाते है , रोने भी नहीं देते है
मुझे आकाश भी छूना नहीं है,बस एक मेरा है स्वप्न ,
मेरे दो आँखों के तारे है, उनकी आँखों में स्वप्न बहुत सारे हैं,
जिनके लिए मैं तत्पर हूँ, कर गुजरने को कुछ भी ,
ये ही मेरी आँखों का है स्वप्न , जिनके लिए मैं जी रही हूँ पल पल
ए पथिक मुझे थकना नहीं है ......
क्युकी गर मैं थक गयी तो उन नन्हे सपनो को कौन संवारेगा ?Tuesday, January 31
Wednesday, January 25
पागल नदी को खुद में समाने को कहो
क्यों उफन उफन नदी का जल समुन्द्र में गिरने को है तैयार
क्युकी उस नदी को कोई भी न खुद में समाने को तैयार
क्यों ऐसा है की कोई भी उस चाहता न है
इस लिए वो लबलबा के है बहने को तैयार
गर प्यार उसको मिल जाता खुद के समुन्द्र से ही
तो न भटकती, न मटकती न चाहतो को चाहती
लो उड़ गयी, जो थी बंध चुकी,
लो मिट गयी जो थी उफनती
मगर सुनो वेग तो कहीं समाएगा
ये नियम हा इस दुनिया का
फिर क्यों न समझो तुम कभी
प्यार दो तो प्यार मिलेगा ही
न दोगे प्यार, तो नदी उफनती किसी और सागर में मिलेगी
हो भी सकता हा वो जल कसैला मटमैला सा हो
पर कौन समझाए उस सागर को
जो तुम प्यार दो तो ही प्यार लो
मदमस्त सा वो सागर जो है
अपने आपे से बहार है
उसे अपने आपे में आने को कहो
उस पागल नदी को खुद में समाने को कहो
Thursday, December 15
आस बाकि है
अपनी तो मौज है यारो
जब हस्ते है तो खुश रहते है
जब ग़म मिलते है तो कविता बन जाती हा
क्या करें आंसू धरे रहते है आँखों मैं,
वरना तो अभी और भी सहने का दम बाकी है
ले लो किस्मत और इम्तेहान
क्युकी टाटा बिरला सरीखे बन ने की आस बाकि है
जब हस्ते है तो खुश रहते है
जब ग़म मिलते है तो कविता बन जाती हा
क्या करें आंसू धरे रहते है आँखों मैं,
वरना तो अभी और भी सहने का दम बाकी है
ले लो किस्मत और इम्तेहान
क्युकी टाटा बिरला सरीखे बन ने की आस बाकि है
Wednesday, December 14
गुलाब की पंखुड़ी
किसी गुलाब की पंखुड़ी से न पूछो
की उसने क्यों काँटों को पाल रखा है
वो आंसू भर कहेगी ये मेरी किस्मत है
ख़ुशी नहीं
औंस की बूंदों को कुछ और न समझना यारो
ये उसी पंखुड़ी के आंसू है और कुछ नहीं
औंस की बूंदों को कुछ और न समझना यारो
ये उसी पंखुड़ी के आंसू है और कुछ नहीं
प्यार हर उम्र मैं, हर दौर मैं बस प्यार होता है
प्यार हर उम्र मैं, हर दौर मैं बस प्यार होता है
इसका कोई और नाम मुझे सूझता ही नहीं
कितना लिखा , कितने शब्द जोड़े निस दिन
मगर प्यार को नाम न कोई दे पाई
हर बार वो आकर्षण प्यार था मुझे यकीं है
क्युकी मेरे दिन रैन इसके अधीन है
मुझे रब से भी पहले जब उसकी याद आई
तो कैसे कह दू की प्यार अब तक न मैं कर पाई
इसलिए हर बार का आकर्षण प्यार होता है
बस कुछ उलझने उसका नाम नफरत बना देती है
मैं फिर से हार गयी , हार गयी
सुबह ने दर्द भरा एक पयाम दिया ,
कुछ टूट गया ह कहीं पर ऐसा काम हुआ ,
वो दूर हो गए हमसे जब हम उनके करीब हुए
खुदाया ये तूने कैसा काम किया?
मैं क्यों नहीं रख पाई उसे उम्र भर के लिए,
उम्र न रहे अब तो कोई है न गिला
जिस के लिए साँसों को उम्मीद से जोड़ रखा था
उन्हें अब खीच रही है किसी की मासूमियत वहां
मैं जानती हूँ कोई उनका इसमें कसूर नहीं
न जानते बूझते उनोने ऐसा काम किया
मगर तन्हाई उनके जाते ही,उलझन बन गयी
मेरी साँसों की डोर से दुश्मनी है क्या पिया?
ना अब तुमरे रास्तो मैं आएंगे
हम तो वो लो है की जलते जायेंगे
मगर खुद को ही जला बैठेंगे इस उलझन में
आंसू अब मेरे तुमको न रोक पाएंगे,
ये लो किसी गैर की मासूमियत जीत गयी
मैं फिर से हार गयी , हार गयी
Tuesday, November 8
sandesh
main mar jane se pehle ye sandesh jaror chod ke jana chahti hoo
ki joothi ijjat ke naam pe jine wale log,
apni or doosro ki jindagi ko jahar banane ke ilava
kuch bhi nahi kar sakte,
ye dogla smaj na to aurat ko jine deta ha
na marne, har baar aurat dhokha khati ha
premika ban ke, biwi ban ke or kabhi beti ban ke
kaash ye log jaag jaye or smajh jayen ki
madhyam wargiye aurat ki sthiti bad se batr ho gayi ha
ki joothi ijjat ke naam pe jine wale log,
apni or doosro ki jindagi ko jahar banane ke ilava
kuch bhi nahi kar sakte,
ye dogla smaj na to aurat ko jine deta ha
na marne, har baar aurat dhokha khati ha
premika ban ke, biwi ban ke or kabhi beti ban ke
kaash ye log jaag jaye or smajh jayen ki
madhyam wargiye aurat ki sthiti bad se batr ho gayi ha
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