ek bacha janam lene wala ha, rota ha
chillata ha, tarapta ha ghabrata ha,
kya bat ha, kyu wo is jag me na ana chata ha?
kyuki jaise hi wo janam lega abhi,
to ab tak jo uski atma swachand thi ghomti
us rab ke ghar me, panah thi doondati
wo ab fas jayegi uljhan me,
is jag ke sare bandhan,
desh ke dharm or jat ke,
bandh lenge use apne , khud ko jag ke hawale..
कागज पर ढल आई है मेरे अक्स की स्याही, कुछ और नहीं मैं बस एक रचना ही तो हूँ if u want to see the poems of my blog, please click at the link of old posts at the end of the each page
Monday, May 7
Sunday, May 6
kyu
BAWRA MAN
BAWRE MAN KO KON SAMJHAYE, MEERA DIWANI PREM ME MOHAN KE
USE YE KON BATLAYE, KI DUNIYA BAWRI KAHE USE....
WO TO PREM DHUN ME MAGAN GAYE, HARI HARI NAM JAPTI JAYE
USE YE KON BATLAYE, KI DUNIYA BAWRI KAHE USE....
ANKH BAND HA TO MOHAN HA, KHULI HA TO MOHAN HA
USE YE KON BATLAYE, KI DUNIYA BAWRI KAHE USE...
USE YE KON BATLAYE, KI DUNIYA BAWRI KAHE USE....
WO TO PREM DHUN ME MAGAN GAYE, HARI HARI NAM JAPTI JAYE
USE YE KON BATLAYE, KI DUNIYA BAWRI KAHE USE....
ANKH BAND HA TO MOHAN HA, KHULI HA TO MOHAN HA
USE YE KON BATLAYE, KI DUNIYA BAWRI KAHE USE...
insaniyat
ham log a sakhi,ajeeb ha
kahi bhi sukun hame nahi ha
shankht kya ha us bache ki
jo janam dharti par leta ha
har koi rab ka banda ,
ma ke pet se hi janmta ha
fir ham log use mulko me
amjo me bant dete ha
shnakht to insan ki insaniyat hi ha
kahi bhi sukun hame nahi ha
shankht kya ha us bache ki
jo janam dharti par leta ha
har koi rab ka banda ,
ma ke pet se hi janmta ha
fir ham log use mulko me
amjo me bant dete ha
shnakht to insan ki insaniyat hi ha
Saturday, May 5
पूर्व ओर पश्चिम
ये हमारे पुराने समाज के वीचार ह..
ये तो ऐसा हुआ के कओवा चला हँस की चाल अपनी चाल भी गया वो भूल,
हम स्वार्थ की अंधी दौड़ मै, क्यों गए शिक्षाये भूल
उनत्ती पाने की इच्छा मै हम, तोड़ गए हम अपने नीयम -असूल
पर मेरे अपने विचार कुछ ये कहते ह...
मै पूर्व की बाते कुछ समझ ना पाऊ आधी सी
एक तरफ उन्नति करे हम, एक तरफ बाते बेमानी सी
कुछ पाने को निकले जब तो, खोना ही ह कुछ हमको
आब प्रगति की दौड़ मै शामिल होना ही ह उन हमको
क्यूकी अध अधूरा सच, झूठ से भी बदतर ह
इसलिये हम पश्चिम अपनाये, अब तो ये ही बेहतर ह..
ये तो ऐसा हुआ के कओवा चला हँस की चाल अपनी चाल भी गया वो भूल,
हम स्वार्थ की अंधी दौड़ मै, क्यों गए शिक्षाये भूल
उनत्ती पाने की इच्छा मै हम, तोड़ गए हम अपने नीयम -असूल
पर मेरे अपने विचार कुछ ये कहते ह...
मै पूर्व की बाते कुछ समझ ना पाऊ आधी सी
एक तरफ उन्नति करे हम, एक तरफ बाते बेमानी सी
कुछ पाने को निकले जब तो, खोना ही ह कुछ हमको
आब प्रगति की दौड़ मै शामिल होना ही ह उन हमको
क्यूकी अध अधूरा सच, झूठ से भी बदतर ह
इसलिये हम पश्चिम अपनाये, अब तो ये ही बेहतर ह..
beti gareeb ki
मै एक मंजिल की तलाश मै चली थी,
बन कर कुछ दिखाऊंगी, मगर
जाने क्यों नजरे घूरती ह मुझे ,
जाने क्यों चीरती ह निगाहे मुझे
हर निगाह जैसे कहा जायेगी मुझे
हर बात रुला जायेगी मुझे
सिसक सिसक, बहक नही
रो मगर कह नही, बेटी गरीब की....कहती ह मुझे
तू बेटी गरीब की...देती ह इल्जाम मुझे .
सांसे तेरी कर्जदार ह माँ, तुने मुझे जन्म दीया
चुभे तो दील मेरा ह टूटता
पर एक घुटन सी आज ह, ये मन मै चुभा आज ह
मै कहॉ स्वछंद के बागो मै घूमा करती थी
मै कहा, चिड़िया सी चेह्का करती थी
आज मै क़ैद हू,समाज मै ना आजाद हू
आज हर नजर मुझे ह काटती
क्यों मै बेटी गरीब की..
बन कर कुछ दिखाऊंगी, मगर
जाने क्यों नजरे घूरती ह मुझे ,
जाने क्यों चीरती ह निगाहे मुझे
हर निगाह जैसे कहा जायेगी मुझे
हर बात रुला जायेगी मुझे
सिसक सिसक, बहक नही
रो मगर कह नही, बेटी गरीब की....कहती ह मुझे
तू बेटी गरीब की...देती ह इल्जाम मुझे .
सांसे तेरी कर्जदार ह माँ, तुने मुझे जन्म दीया
चुभे तो दील मेरा ह टूटता
पर एक घुटन सी आज ह, ये मन मै चुभा आज ह
मै कहॉ स्वछंद के बागो मै घूमा करती थी
मै कहा, चिड़िया सी चेह्का करती थी
आज मै क़ैद हू,समाज मै ना आजाद हू
आज हर नजर मुझे ह काटती
क्यों मै बेटी गरीब की..
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