Sunday, July 18

जुगनूं हाथ मॆं आते ही बुझ क्यूँ जाते ह?

Blogvani.com

जुगनूं हाथ मॆं आते ही बुझ क्यूँ जाते ह?
हर इन्सान को आजादी प्यारी ह प्यारे,
ये कर देती ह सब के वारे न्यारे!
आजादी हर फिजा को खुशनुमा बना देती ह
और पतंगों को भी चमकना सिखा देती ह,
इसलिए जुगनू हाथ मॆं आते ही बुझ जाते ह,
अपने कैद होने का गम मानते हैं ,

परिंदों को सोने के पिंजरे भी क्यों न सुहाते हैं ?
क्यों सब पा के भी वो उदास हो जाते ह?
क्यों गगन के ललाट पर वो मुस्कुराते हैं?
इसका भी जवाब आजादी ह प्यारे,
खुला गगन  परिंदों को भी ,हर वक्त पुकारे!

आजादी जितनी खुशनुमा ह उतनी बड़ी जिम्मेवारी भी
ये समझे अगर तो बन सकती बिगड़ी बातें सभी,
 परिंदे अगर स्वतंत्र  गगन मॆं सुहाते ह,
तो बहेलियों के जाल मॆं भी कभी  फंस  जाते ह
और अपने हाथों अपनी आजादी गवांते हैं!

परन्तु एक की  आजादी ,दूसरे  का कर्त्व्ये ह,
इसलिए हमें इसे और खूबसूरत बनाना ह,
आजाद भारत को एक निर्भर देश बनाना ह,
असुरक्क्षित   माहोल जो बना हुआ ह,
उसे अपने सुकर्मों से सुरक्क्षित  बनाना ह!

क्यूकी हाथ मॆं आयें तो जुगनू बुझ जाते ह
और अपने कैद होने का गम मनाते हैं!

Monday, May 31

वो हरदम मेरे साथ है!

Blogvani.com 
उसकी आँखों मॆं शरारत है  ,
उसकी बातो मॆं एक कशिश  है
उसका आना मेरी जिन्दगी मॆं ,
उस खुदा की नियामत है ,
हर बात मॆं उसकी एक नयी बात है
मुझे पता है कोई हो न हो ,
बस वो हरदम मेरे साथ है!


उसकी सांसों मॆं तरंगों सा अहसास है,
उसकी हर हँसी मॆं हजारो
 घुनगुरोउन   की खनक है,
उसके पास होने का अहसास  ही
 मेरा आत्मविश्वास है ,
मुझे पता है कोई हो न हो
बस वो हरदम मेरे साथ है

मेरी हर सुबह उसकी मधुर आवाज से
शुरू होती है ,मेरी हर बात  मॆं
 बस उसकी बात होती है
हर रात के शुरू होने मॆं और दिन,
ख़त्म होने मॆं भी उसका ही साथ है
मुझे पता है  कोई हो न हो
 बस वो हरदम मेरे साथ है!

लोग कहा करते है  कि
पराये कभी अपने हुआ नहीं करते
लोग युहीं कहा करते है  कि फ़रिश्ते हुआ नहीं करते 
मगर उसकी आवाज मॆं
फ़रिश्ते की सी आवाज है
मुझे पता है कोई हो न हो
बस वो हरदम मेरे साथ है!

Friday, May 21

जुलम बर्दाश्त नहीं होता

सहनशक्ति की देवी मुझे  समझो न,
मॆं भी इंसान हूँ  मुझे   भी ह जीना
मेरी भी बहुत सी ख्वाहिशें,
सुप्त ह पड़ी हं ऑंखें मूंदे,
न जगाओ की वो रावन है  एक सोया!
मुह बाये खड़ी हो जाये विकराल रूप मॆं,
और एक दिवस मुझे  वो कर लेंगी जब अपने बस मॆं!
मॆं फिर एक विक्षिप्त, आहत पंछी  की तरह
चल पडूँगी  ऑंखें मूंदे  उस पथ पे
मुझे रोक लो की बस हो चुकी है   बहुत
मुझसे अब ये जुलम अपनी आत्मा पे बर्दाश्त नहीं होता

Wednesday, May 19

aansoon main bahati ab nahi

आंसूं मॆं बहती अब नहीं
तुमको मॆं आंसू दिखाती अब नहीं
मगर ऐसा नहीं की रंज कोई मुझको   नहीं
मॆं तो पगली पीड़ा अपनी बताती तक नहीं
हंस देते ह लोग और जले पर नमक छिड़का करते ह बस
मॆं हँस देती हूँ जख्मो पे अपने ही, पर एक भी शब्द
जताती अब नहीं
एक उम्मीद ह उनसे की शायद वो ही जाने  मेरी अनकही बातें
मगर अब उनसे भी कोई उम्मीद रख पाती अब नहीं

Saturday, May 8

मुझे चेहरा देख के आदमी पहचानना आ गया   बहुत खाए ह धोखे इसलिए धोखे बाजों को जानना आ गया

Sunday, February 7

KAMAN MERE HATHO ME THI HI NAHI

KASH KI MERI JINDAGI MERE HATH HOTI
KASH ME ISME BHAGYE KI KALAM SE KUCH BHI LIKH LETI
KASH KI MAIN LIKH LETI APNA BHVISHYE KHUD HI APNE HATHO SE
FIR MUZSE TUM YE PRASHN NA KARTE
MAIN PARISITHITYO SE LAD KE SAB KAR PAYI
 YE TUME KYU NAJAR AYA NAHI?
MUZME GUN HA KITNE HI, KYU TUME NAJAR AATE NAHI
MAIN ARJUN HOTI OR LAKSHYE DEKH LETI
PAR KAMAN HI MERE HATH ME THI NAHI
NISHANA ME LAGA PAYI HI NAHI
 KABHI MERI KAMAN MERE MAT -PITA KE HATHO ME THI
 KABHI MERI KAMAN MERE PATI PARMESHWAR KE HATHO ME THI
 ME TO APNI KISMAT KABHI LIKH PAYI NAHI
 WARNA ME AWASHYE HI EK HI DISHA ME BADTI