मॆं अपनी हँसी कि आवाज मॆं अपने ग़मों को
जज्ब कर लेना चाहती हूँ
मॆं दुनिया के शोरो गुल मॆं खुद को
ख़त्म कर लेना चाहती हूँ
मेरी हँसी मॆं मधुर खनक नहीं ह
मेरी आवाज मॆं मिठास नहीं ह
बस एक कर्कश सी हँसी
मेरे वजूद का हिस्सा बन गयी ह
मॆं उस हसीं को फिर से मधुर बनाने कि
असफल कोशिश करना चाहती हूँ
मेरे अपनों ने मेरा अपना होने का
बहुत दावा किया ह हर वक्त
उन अपनों से एक बार फिर
साथ देने की भीख मांगना चाहती हूँ
मॆं फीर से एक बार जीने कि असफल कोशिश
करना चाहती हूँ,
मेरा साथ दे दो , मॆं अकेली घुट घुट के
मरना नहीं चाहती हूँ
कागज पर ढल आई है मेरे अक्स की स्याही, कुछ और नहीं मैं बस एक रचना ही तो हूँ if u want to see the poems of my blog, please click at the link of old posts at the end of the each page
Tuesday, October 12
Wednesday, October 6
टूटे सपने
एक तो टूटे सपने हमको तोड़ जाते ह,
एक तो टूटे रिश्ते हमें रुलाते ह,
और एक दुनिया के ताने,
जहर बुझे तीर कि तरह लग जाते ह,
एक तो धोखा कहते ह लोग
और एक धोखा खाने वाले को ही
लोग हमेशा सुनाते ह
और धोखा देने वाले साफ़ बच जाते ह
कैसा ह दस्तूर ए दुनिया ?
पल पल रोने वाले , बदनाम हो जाते ह
और रुलाने वाले , हँसते चले जाते ह
काँटों सीजिन्दगी जिनी कितनी मुश्किल ह
ये दर्द तो वोही जानते ह जीसे
ये जिन्दगी जिनी पड़ती ह
वो भी उन शर्तो पर जो लोग हमें बतलाते ह
एक तो टूटे रिश्ते हमें रुलाते ह,
और एक दुनिया के ताने,
जहर बुझे तीर कि तरह लग जाते ह,
एक तो धोखा कहते ह लोग
और एक धोखा खाने वाले को ही
लोग हमेशा सुनाते ह
और धोखा देने वाले साफ़ बच जाते ह
कैसा ह दस्तूर ए दुनिया ?
पल पल रोने वाले , बदनाम हो जाते ह
और रुलाने वाले , हँसते चले जाते ह
काँटों सीजिन्दगी जिनी कितनी मुश्किल ह
ये दर्द तो वोही जानते ह जीसे
ये जिन्दगी जिनी पड़ती ह
वो भी उन शर्तो पर जो लोग हमें बतलाते ह
Saturday, September 25
Wednesday, September 1
कोन ह ऐसा पारखी ?
आईने मॆं कभी चेहरा देखा करती हूँ तब
लगता ह जाने क्यों जब तब
मेरे चेहरे पर वक्त ठहर सा गया ह
वही जाना पहचाना सा चेहरा ह
वही हँसी ह, वही उमंगें
वही आज भी कुछ कर गुजरने का जोश
मगर एक अजनबी सा `मॆं`
मुझमे आ गया ह,
मॆं चीजो को परखने लगी हूँ,
उनको देखने का नजरिया बादल सा गया ह
पहले जिन चेहरों मॆं मॆं केवल खूबियाँ दून्डा थी करती
अब उन चेहरों की महीन रेखाओं मॆं भी?
नजर आ जाती ह कोई त्रुटी,
और मॆं कहने से खुद को रोक नहीं पाती
बार बार मेरी जिव्हा मेरा अनुभव ह बताती
पर एक कसक सी कसमसाती ह अभी भी
कि मेरे इस अनुभव को कोई पहचानता क्यों नहीं?
कोन ह ऐसा पारखी जो, समझेगा कभी मुझको भी!
लगता ह जाने क्यों जब तब
मेरे चेहरे पर वक्त ठहर सा गया ह
वही जाना पहचाना सा चेहरा ह
वही हँसी ह, वही उमंगें
वही आज भी कुछ कर गुजरने का जोश
मगर एक अजनबी सा `मॆं`
मुझमे आ गया ह,
मॆं चीजो को परखने लगी हूँ,
उनको देखने का नजरिया बादल सा गया ह
पहले जिन चेहरों मॆं मॆं केवल खूबियाँ दून्डा थी करती
अब उन चेहरों की महीन रेखाओं मॆं भी?
नजर आ जाती ह कोई त्रुटी,
और मॆं कहने से खुद को रोक नहीं पाती
बार बार मेरी जिव्हा मेरा अनुभव ह बताती
पर एक कसक सी कसमसाती ह अभी भी
कि मेरे इस अनुभव को कोई पहचानता क्यों नहीं?
कोन ह ऐसा पारखी जो, समझेगा कभी मुझको भी!
Tuesday, August 24
meri jaan ka dushman
ek ek pal jina mushkil sa hua,
uski yad main ye dil karta ha roya,
wo meri saans sa muzme samaya ha,
tadap tadap, ankhoo main nasha chaya ha,
kuch in dooriyon ka kasoor ha , kuch mosam ka,
mere dilo dimag par uska khumar chaya ha,
jis kalam ko main kitab main rakh ke kahin bhool gayi thi,
us kalam ne uske wajood ko fir apnaya ha,
fir wohi jaanewafa muzko yad aya ha
fir wohi jaan ka mere dushman ban aya ha
uski yad main ye dil karta ha roya,
wo meri saans sa muzme samaya ha,
tadap tadap, ankhoo main nasha chaya ha,
kuch in dooriyon ka kasoor ha , kuch mosam ka,
mere dilo dimag par uska khumar chaya ha,
jis kalam ko main kitab main rakh ke kahin bhool gayi thi,
us kalam ne uske wajood ko fir apnaya ha,
fir wohi jaanewafa muzko yad aya ha
fir wohi jaan ka mere dushman ban aya ha
क्युकी आज प्रेम दिवस है !
तनहा रहे , तनहा सफ़र था
जब तुम मिले तो क्या मंजर था
मैं वीराने में भटक रही थी ,
और मेरा साया भी मेरा न हमसफ़र था ,
आंसू टूट कर मोती से बिखर गए थे,
और जर्रे जर्रे में अकेलापन बसर था
मैं खामोश रह गयी जब मिले तुम,
और ख़ामोशी मैं एक प्रशन भर था ,
की मैं इस सूनेपन से घबरा गयी हूँ
अब अकेले चलते चलते पथरा गयी हूँ
तुम आ अमृत से जीवन भर दो
और कंटीली रहो को फूलों से भर दो
आज का दिन उस के लिए शुभ है
क्युकी आज प्रेम दिवस है !
Friday, August 13
जिंदगी का अनुभव
जिंदगी ........
एक असीमित विस्तृत सा मरुस्थल ,
जीवन के प्रत्येक पहलू पर ,
चन्द्र की भांति लगा हुआ एक ग्रहण,
एक कड़वाहट का अहसास,
बिसरी भूली सी मिठास,
और कभी कभी उस कड़वाहट को अपना कर ,
सदा मुस्कुराने का हमारा एक कृतसंकल्प,
सदैव हमको परेशानी मैं डालने वाला हमारा ही व्यक्तित्व,
हमें एक अजब उलझन में डालता नग्न सत्य,
उस जीवन के व्यसनी हम
उस कंटीले जीवन को जिए जाते है
क्यों कि सत्य हमें ओछा और घिनौना,
और कभी नग्न तलवार सा,
प्रतीत होने लगता है,
और जो जिंदगी ....
झूठ के सहारे
व्यतीत करनी किसी ज़माने में
जहर सी लगती थी
फिर वही झूठी जिंदगी झरने सी मीठी
लगने लगती है,
परिस्थितियाँ........
इंसान को ऐसा बना देती हैं कि वो,
एक झूठ से दूसरे झूठ के अन्दर
इतना उलझ जाता है,
कि चाह कर भी मकड़ी के समान ,
उस झूठ के जंजाल का आवरण उतार कर
फैंक ही नहीं पाता, रोना चाह कर भी अपने आंसुओं को ,
जज्ब कर लेना बेहतर समझता है ,
ताकि लोग .........
उन आंसूओं को ,
मगरमच्छ के आंसू समझने कि भूल न कर बैठे,
वो अपने छिले हुए जख्मो पर खुद ही ,
हस्ते हस्ते नमक छिडकता रहता ह ,
शायद इसी मैं उसे सब से जायदा सुकून मिलता ह
फिर आंसू धीरे -धीरे सूखने लगते है ,
और इसे ही लोग जिंदगी का अनुभव कहते है !
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