Friday, December 3

aj ka vichar

kabhi
kabhi shuny sa mastishk ,
 sab socho ko ektrit kar kuch na sochne ka abhiny karta ha,
 asl main wo kisi bhi pratikriya se bachta ha,
 parantu wastv main mastishk kabhi vichar vihin nahi ho sakta

Friday, November 26

तस्वीरें

तस्वीरें हमेशा  हस्ते   हुए खिचवाई जाती ह,
तस्वीरों के पीछे सदा कहानिया  छुप जाती ह
तस्वीरों से इंसान कि खुशहाली का अंदाजा लगाने वाले लोग
तस्वीरों के पीछे का सच कभी जान पाते नहीं
कभी जान भी जाये तो समझ पाते नहीं

Thursday, November 25

is shahr ke bashar

बहुत से मंजर देखे , ताउम्र देखते रहे
दुनिया चाँद पे पहुंची होगी
मगर यहाँ रहने वाले यही घुट घुट के मरते रहे
अपने आगे लोगो के जोशो खरोश को ठन्डे होते देखा मैने
बहुत से नयी सोच वाले, अपनी सोच को बदलते गये ,
अपने आगे सपनों को ढेर होते देखा मैने,
एक रोटी का टुकड़ा भी नस्सेब न हुआ जब
तो बशर इस शहर के उसी टुकड़े के लिए लड़ते गये
इतना कोई न सोच पाया कि चलो हाथ बड़ा के
रोटी और एक बना ले,बस एक उस चाँद के लिए
सेकड़ो रोज मरते गाये, लुटते गये , पिटते गये
ए खुदाया इस शहर के हिस्से मॆं कुछ नेकी बाँट
वरना कौरव और पांडव न हर जन्म मे लड़ते रहे मिटते रहे

Monday, November 22

door talak

मुझको अभी दूर तलक जाना ह, यही एक मंजिल नहीं जिसको मुझे  पाना ह,
बहुत अभी रास्ते ह जिन पर चल के देखना ह,
और चलते चलते खुद से भी दूर कहीं जाना ह,
मॆं उनमे से नहीं जो थक के बैठ  जाया करते ह,
मॆं वो नहीं जो हार जाया करते हैं
मुश्किलें आन पड़ी तो क्या हुआ
 मुझे  इनसे पार पाना ह,
मुजे अभी दूर तलक कहीं दूर तलक जाना ह



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Friday, November 19

मॆं नहीं हूँ

मॆं बस मॆं नहीं हूँ
मॆं एक अबला हूँ कभी जो जुल्म के आगे झुक  जाती ह
कभी मॆं एक मशाल हूँ जो आग बन के दहक जाती ह
मॆं एक आत्मा हूँ उस मृत शरीर  की
जो कभी आग मे झुलसा होगा

कभी मॆं एक शीत पवन का झोंका हूँ
जो कभी बहकी सी रात मॆं महका होगा
मॆं कभी परिस्थितयो के आगे झुक जाती हूँ
मॆं कभी छोटी सी बात पे अड़ जाती हूँ
कभी हठीली  हूँ, कभी समझने मॆं जटिल हूँ
परन्तु मॆं जो दिखती हूँ उससे कहीं अधिक सबल हूँ
कभी प्यार सी निर्मल हूँ
पर मेरी रचनाओ कि मॆं
हरदम मॆं नहीं हूँ

Thursday, October 21

मंजिले और हँसी हो जाती हैं

जब  भी आसमान को छूने लगती हूँ मॆं,
मंजिले और दूर कहीं नजर आती हैं,
जब भी सोचती हूँ कि बस अब,
यही तक ह जाना,
रास्ते की पेमयिशें और फिर और ,
बढती ही चली जाती ह,
इस कदर शिदत से मंजिल कि चाह करना,
शायद यही मेरा कसूर ह,
मंजिल को पाने के लिए,
जी जान लगाना, शायद यही मेरा कसूर ह,
वो लोग भी हैं ज़माने मॆं जिनके,
कदम मंजिले खुद छू जाती ह,
वो कुछ करें न करें मगर उनके लिए
राहें  खुद ही खुल जाती ह
पर मॆं जानती हूँ
जितनी शिद्दत से किसी चीज को चाहो
उसे पाने का नशा उतना ही हसीं होता ह
इसलिए दूर हुई मंजिले और हँसी हो जाती हैं

Saturday, October 16

काश के सत्य के पथ पर चल पाते हम

काश के सत्य के पथ पर चल पाते हम,
काश जो दिल मे ह कह पाते हम,
काश कि सब सत्य होता
कुछ छलावा  न होता,
विष्णु कि मोहिनी मॆं जग
 भरमाया न होता,
न हम  दुनिया मे आने के उपरान्त ,
उस प्रभु को भूल जाते ,
जिसने जन्म दिया उस,
 परमपिता को याद रख पाते,
इस दुनिया के गोरखधंदे मॆं
न फंस जाते हम
झूठ कि शरण मे न खुदको छुपाते ह
गर्व से  खुद से अंखिया मिला पाते हम
काश के सत्य के पथ पर चल पाते हम