Sunday, February 20

एक सम्पूर्ण स्त्री

कभी मेरी माँ ने मुझे कहा बनो एक सम्पूर्ण स्त्री ,
कभी मेरे पिता ने मुझे परिपूर्ण कामकाजी औरत बनने की सलाह दी,
कभी किसी ने मुझसे एक अच्छी माँ बनने की उम्मीद की,
कभी किसी ने मुझे एक सुघड़ गृहणी बनने की आशा की,

मैं अनजाने में उनकी इच्छाओ को बना उद्देश्य चलती गयी
और अनवरत अधूरेपन के ग़म को पाले रही
खुद की अपूर्णताओ  को छुपा छुपा के जीती रही
कभी अच्छी माँ , कभी अच्छी बीवी,
कभी अच्छी गृहणी, और कभी अच्छी खानसामा
काफी कुछ बनी, पर बहुत कुछ नहीं बन पाई

....................अधूरी कविता





ek sach meri jindagi ka, aj ka vichar

jindagi poori tarah perfect banatebanate kabhi kabhi ham tahk jate ha
doosro ko khushi dete dete, kabhi hamari khushiyan gum ho jati ha
kabhi jab ham tahk jate ha to kin moments ko ham enjoy kartea ha
 kabhi socho. shayd jo moments, sabse imperfect thi
mene apni life main bahut si imperfect moment ji kar dekhi ha
and i m sure, they were the best moment of ma life
so try to be lil imperfect, and live your life
without the things, you miss in ur life






Wednesday, February 16

kon kis kabil ha kya pata,kabil to banata ha sabko wo khuda,
tume hunar ki kadr nahi to na sahi,sabko kisi na kisi kabil banata ha khuda

Sunday, February 13

khush raho

jindagi me ham aksar jo nahi ha uske liye rote taraste ha


jab ham kam karte ha to khali wakt ke liye rote ha

kehte ha a khuda maaf karna wakt ha nahi tuze yad karne ko

jab ham khali hote ha, to apni puarani masroofiyat ko yad karke rote ha

...ki a khuda muze fir se pehle sa masroof bana

isliye bas itna karo, jo ho usme khush ho ke jiyo

aj wakt ha use bhi has ke jiyo

chinta na karo jald hi masrrof ho jaoge

ye dua ha, ki fir se hasoge, muskuraoge

Tuesday, January 11

एक नयी चुनौती

सर्द हवाओ को हमने ही अपनाया ह
एक नयी चुनौती को हमने खुद बुलाया ह
क्या करें कि आराम हमें पसंद नहीं
हमें तो खुद के ही उद्देश्यों ने भरमाया ह
हम सुबह शाम बस एक बात सोचते ह
क्या सोते हुए कोई सपना पूरा हो पाया ह?
इसलिए नयी चुनोतियों को मैने फिर से
अपनाया ह

Tuesday, December 14

or khud ko badlte raheखुद को बदलते रहे

आज कि दुनिया मे भी चाहे औरत का ओहदा बढ गया हो , उसने अपनी महन्त और लगन से  चाहे जो भी मंजिल हासिल की हो मगर आज भी उसकी उन्चयियो को उसके  चरित्र से जोड़ कर देखा जाता ह, वो उन्चयियो तक पहुँचने के ललक भी नहीं छोड़ सकती और न ही अपने अन्दर कि घुटन को बयां कर सकती ह:

अश्क बहते रहे और शब्द कडवे होते रहे
लोग बदल जाने को मुझे बार बार कहते रहे
मॆं रोज घुटती रही और कभी खुद को बदलती रही
इतना बदल गयी कि हँसना भी भूल गयी
एक तो पहले ही हंसने के बहाने कम थे जिन्दगी मॆं'
जो मिला एक भी बहाना कहीं हंसने का तो लोग जलते रहे
चरित्र तो जैसे कोई शीशा हुआ, जीसे लोग अपने ही रंगों मे रंगते रहे
जिसका जी चाहा,उसने  उस दर्पण को धूमिल किया
अपनी तार- तार बातो से,चरित्र को दागदार किया
हम तो पागल , उस शीशे के धुन्दला होने पर
सिसकते और रोते रहे
ये न पता था कि ये तो बस शौक  ह लोगो का
उछालना कीचड़ दूसरो पे , खुद का कम साधने को
मगर हम लोगो कि बातो से बस डरते रहे

दूसरो से गिला इतना नहीं मगर
जब दिल का हाल किसी अपने से कहा , तो ये जवाब मिला
जरूर तुम्हारे तौर तरीके , अलग से ह जुदा से ह
जो लोग तुमको सही न जानते ह
हम चुप चाप अपनों के इल्जाम भी सुनते रहे
अश्क दिखाए जो अपनों को , तो अपनों ने कहा
आंसू हल नहीं ह किसी भी चीज का

जज्ब कर के आंसू फिर हम
सुबकते रहे, उफ़ न कि हमने और हम फिर
खुद को बदलते रहे
हम इतना बदल चुके ह, और बदल रहे ह खुद को
जिन्दगी को प्यार करने कि जगह उससे नफरत करने लगे





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Saturday, December 4

आज का विचार

कहू क्यों मै अपनी पीर किसी को, जब कोई समझे न मेरी पीर
दुखड़ा मेरा ,कोई न समझे बस समझे रघुवीर