Thursday, March 17

कहीं इंतजार में ही मेरी ऑंखें पथरा न जाये( ek nivedan

मुझे क्या चाहिए, क्यों कब और कैसे?
ये बताने के लिए मेरे साथी शब्द ही तो ह,
मुझे  , जो दो पल बचे ह 
उनमे  तुम्हारा साथ चाहिए
 क्युकी जी भर के चाहती हूँ जीना
मैने  तपते रेगिस्तान की रेत पर
बहुत से दिन रैन 
नंगे पाँव चल कर बिता दिए ह
और अब उन पगों पर छाले पड़ गए ह
मैं जब जब चलती हूँ काँटों पर 
लगता ह की कोई जख्मो पर नमक छिड़क रहा ह
मुझे अब एक शीतल सी फुहार चाहिय्र 
मैं चाहती हूँ की मेरे बच्चो को कुछ बनाने का अपना सपना
मैं तुम्हारे साथ   dekho , तुमारी तकलीफों को अपना कर
अपनी तकलीफे तुम्हारे साथ bantoo 
फिर वो दुःख , चिंता बस चिंतन बन के रह जाएँ
मैने बहुत से ख्वाब देखे ह
पर वक्त थोडा ह
इसलिए  तुमसे एक निवेदन ह
मेरे पास जो समयाभाव ह
उसे समझ कर , तुम जल्द
से जल्द मेरे  सपनो में रंग भर दो
कहीं इंतजार में ही मेरी ऑंखें पथरा न जाये 





 

14 comments:

kunwarji's said...

bahut hi badhiya bhaav...
sundar...

kunwar ji,

VISHWA BHUSHAN said...

sundar... Sreshthatar hone ki poorn sambhavnayen hain...prayas yathavat rakhiye... Meri shubhkamnayen...

Narayan said...


अनुभूति-- 10, "तड़प"----27.12.06
अनुभूति--10, "तड़प" 27.12.06(1.30 a.m)

सुख सुख नहीं केवल, दुःख सहने का सिला है,
इस सुख को, अल्लाहताला से ये गिला है,
क्यों मुझको इतनी कम उम्र जीने का मोका मिला है,
हर आदमी क्यों मेरे पीछे पड़ा है,
हर कोई मुझे अपने साथ बांध कर रखना चाहता है,
पर मेरा जिस्म, उनके हाथ से हर रोज फिसलता जाता है,
लगता है खुदा ने, मेरे जिस्म पे इक अजीब तेल मला है,
जो पकड़ता है मुझे, वो पूरी जिन्दगी तड़पता है,
इस तेल का असर आजीवन, उसके दिलो दिमाग में बसता है,
इसी की निशानी को लेकर, वो मुझे ढूंढते भटकते फिरते हैं,
मुझको फिर से पाने की चाहत में, दुःख के हर दौर से गुजरतें हैं,
कर जाते हैं वो सभी कुछ, जिसको करने की ताकत वो नहीं रखते हैं,
रोते, छटपटाते, हर घडी, हर पल मुझे वो याद करतें हैं,
कभी डिप्रेशन तो कभी एग्रेशन में, वो यूँ ही वक्त बर्बाद करतें है,
मेरी छीना झपटी में, वो हर पाप तक कर जातें हैं,
कर कर के अच्छे बुरे करम, वे लाख चौरासी के चक्कर में आते हैं,
देख देख कर मेरे सपने, वो अपने को भर्मातें हैं,
रहता हूँ मैं जब उनके साथ, सुध मेरी वो कभी नहीं लेते हैं,
जाता हूँ जब दूर में उनसे, फिर मेरी ओर चल देते हैं,

कैसा अजीब ये चक्कर चलाया, इस परवरदिगार ने,
खुद करके मुझे वो आगे, खुद वो पीछे हट जाते हैं,
इसीलिए दुःख से तड़पते लोगों के पास वो भेजतें, मुझे हैं,
सुख के रूप में उन्हें, खुद अपनी झलक दिखाते वो हैं,
सुख और दुःख ये दोनों, उनके ही रूप बने हैं,
"श्री चरनन" में आकर दोनों एक रूप हो जाते हैं,
दिया भरम है दुनिया को उन्होंने, अपने तक आने का,
सच्चे हृदय से जो दुःख अपनावे, वही इस भेद को जानेगा,
सुख से दुःख है, दुःख से सुख है, बन गए ये "अर्धनारीश्वर",
दोनों भाव जब मिल जाते, कहलाते ये ईशवर,

इधर से देखो, खड़े वो मिलते हैं, उधर से देखो, खिल्खिलातें वो हैं,
दोनों को देखता जो एक साथ, पाता वही "श्री चरनन" में वास,
रहती नहीं इच्छा कोई उसके आस पास, करता है वो कैलाश में निवास,
न इधर रुकता है, न उधर भटकता है, रखता नहीं वो किसी से आस,
बन जाता है वो दाता, हर रोज वो केवल उसी से है पाता,
न उसे कोई सुख व् दुःख सताता, हर वक्त वो अल्लाह ताला से है बतियाता,
उसका दिया इंसानी जीवन, मौज से है बिताता,
वास्तविक रूप से "सहजी" बनकर, राग "श्री माँ" के गाता,
----------नारायण

मोहिन्दर कुमार said...

आपकी कविता सुन कर एक पुराना गीत याद आ गया...
"हम इन्तजार करेंगे तेरा कयामत तक.... खुदा करे कि कयामत हो... और तू आये"

और प्यार में अक्सर "पलों का" वादा कर के "बरसों में" लौटते हैं...
बेहतर यही है कि नजरों को दरिचा बना कर बिछाने की बजाये कोई महफ़िल रोशन कीजिये.. क्या खबर वो परवान उधर आ ही जाये...


व्याकरणिक त्रुटियों के अलावा आपकी रचना सशक्त है

दर्शन कौर धनोए said...

बहुत सुंदर रचना !
अपने ब्लोक से बाहर निकलो --दुसरे ब्लोक पर भी जाओ--जो आप लिखते है उन्हें दुसरो तक पहुँचाओ -- मेरे ब्लोक पर आपका स्वागत है

Shambunath said...

adbhut...apratim

Shambunath said...

adbhut...apratim

shaveta said...

dhanywad, ap sabhi ka bahut bahut dhanywad...mere pas shabd nahi ha ki main ap logo ka kis prakar dhanywad karo, ki apne apna mulwan wakt meri rachnao ko padne me lagaya...bas is wakt jindagi ki aise uljhan me hoo ki apne blog se alg kahin or jane ke wakt hi nikal nahi pati.. magar mera hridye ap logo ka abhari rahega sada

Pavan Gurjar said...

dard bhi khamosh rahkar meri ankhoan ki nami ka lutff utha raha hai ,hai sare saher me ek khusiyoan bhara mahol or pareshaniyan mere hi hissa hajar q a rahi hai ,,,,nice..

Pavan Gurjar said...

hame bhi akash yahi baat badi sataya karte hai ,gamm mai bhi jidagi ghasaya karti hai ,mere askoan ki shihayi ka kya kahna mere har dard ko wo jama ke likhti hai ,sayad meri jindagi mai ab wo noor nahi raha esliye har din maushi mujhe bada satati hai ,.......nice....

Roney said...

did u read middle age women ?

Anil Avtaar said...

Narulaa ji aapki rachnayein mujhe bahut pasand aayin.. likhte rahein... kabhi kisi aalochanaon ki or dhyaan na den.. aalochnaon se shakti arjit karein aur bhi acchhi likhne ki.. keep it up... mere blog ko v jaroor watch kijiyega aur jaroori salaah dijiyega.. www.anilavtaar.blogspot.com

Anil Avtaar said...

Narulaa ji, aap ko maine padha, bahut hi acchhi rachanayein karti hain aap.. aur ek baat.. kabhi aalochnaon se ghabrayen nahin, darasal aalochanayein hi to aur acchha kar pane ki taakat deti hain.. likhte rahein.. mujhe padhna chahti hain to www.anilavtaar.blogspot.com par hamare blogs jaroor padhiye aur jaroori sala bhi denge, aisi hum ummmed karte hain.. keep it up..

shaveta said...

jaror sir apki alochnayen sir mathe par, usme bhi ap logo ka pyar ha