Tuesday, November 8

duniyadaari

वो इंसानियत को कोई रिश्ता क्या समझे 
जिन्हें जिस्म की भूख ही दिखाई देती है
वो कैसे चैन से जीने दे किसी और  को
जिन्होंने जिंदगी दूसरो की बैचेनी से बनायीं होती है
जिनके लिए औरत कोई खिलौना है
वो अब भी इस धरती पे बोझ बनके जिन्दा है
बस वो ऐसे जानवर है , की उन्होंने औरत के चरित्र पे
ऊँगली बस टिका राखी है  , ऐ राम क्या तुझसे शिकायत करुं  ? 
तेरे युग से ही सीता पे लोगो ने ऊँगली उठाई रखी है ,
कैसे नामर्द पैदा हो गए है इस कलयुग मैं,
जिन्होंने दुनिया के डर से, नजरें झुका रखीं है
फिर वो कहते है ये, क्या करें दुनिया का दस्तूर है ये,
बस अपने फायदे के लिए दुनियादारी रखी है 

8 comments:

ravi solanki said...

sahi kaha hai aapne. Aaj insan bhale hi chand par jata ho magar is duniya k ritirivaj samaj k naam par ho rahe atyachar. Nari jati ka sosan abhi tak puri tarah se khatam nahi huva hai. Duniya me aaj bhi stree jati ko wo maan sanman wo rutba nahi milta. Sahi mayne me yeh desh tabhi aazad hoga jab har stree ko sanman milega.par kahi na kahi hum yeh bhul jate hai ki Duniya ki sabse badi shakti stree hai jo mata bhai hai bahen bhi hai hamare sukh dukh ka sathi bhi hai aisi jagat ki har jagdamba ko mera salaam.

shaveta said...

vicharo ko sarahne ke lie dhanywad

RDMANMOHAN said...

जितने करीब से देखा तेरी तस्वीर को, बड़ी दूर पाया,
न मेर आँखों का दोस था, न मेरे दिल में कोई और था,
फिर भी उम्र गुजर गई तेरे करीब आने में, आखिर वो दिन आया मै तुझे छू पाया, मगर इसका क्या? तू टंगी थी मेरे कमरे की दीवार पे, मै बैठा था पागलखाने में |
माफ कीजियेगा मै कबिता लिखना नहीं जनता लेकिन आप बहुत अच्छा लिखती है
R D Manmohan Mishra
Freelance journalist & political analyzer
chennai
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shaveta said...

dhanywad

सागर said...

behtreen prstuti...

सागर said...

bhaut hi khubsurat.....

विपिन सिंह said...

स्त्रिया: समस्ता: सकला जगत्सु तव देवि भेदा:....

विकास की ओर उन्मुख हमारे समाज में इस विषय की प्रासांगिकता आज भी बनी हुई है, धन्यवाद् श्वेता जी ..

विपिन सिंह said...

स्त्रिया: समस्ता: सकला जगत्सु तव देवि भेदा:...
विकास की ओर उन्मुख हमारे समाज में इस विषय की प्रासांगिकता आज भी बनी हुई है धन्यवाद् श्वेता जी ..