Thursday, December 15

आस बाकि है

अपनी तो मौज है यारो
जब हस्ते है तो खुश रहते है
जब ग़म   मिलते है तो कविता बन  जाती हा
क्या करें आंसू धरे रहते है आँखों मैं,
वरना तो अभी और भी सहने का दम बाकी है
ले लो किस्मत और इम्तेहान
क्युकी टाटा बिरला सरीखे बन ने की आस बाकि है

7 comments:

sushma 'आहुति' said...

बहुत खूब.....

Kamlesh Kumar Diwan said...

achcha likha hai or prayas kare

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...






आदरणीया shaveta ji
सस्नेहाभिवादन !

निराले अंदाज़ हैं आपके:)
अपनी तो मौज है यारों
जब हंसते हैं तो ख़ुश रहते है
जब ग़म मिलते है तो कविता बन जाती है …

आप सदैव हंसती रहें , ख़ुश रहें … और कविताओं का प्रसाद बांटती रहें …
और हां , टाटा बिरला बन जाएं तो हमारा भी भला कर दीजिएगा …
:))))

बहुत बहुत मंगलकामनाओं सहित…
- राजेन्द्र स्वर्णकार

shaveta said...

ha jaror icha to ha, asal me jane lakhshmi or sarswati ek saath rehti nahi, isliye ham jaise budhijiwi log hamesha jindagi se sangharsh karte reh jate ha.......

anju(anu) choudhary said...

hahahahahaha....bahut khub shaveta..

umeed mat khona kabhi ..keep it up

shaveta said...

ji anju ji umeed par hi to duniya tika ke rakhi ha, or aisa bhi nahi ki ham jaise sanvedansheel vyakti unchaiyo ko choo nahi sakte... ham log jo bhi karte ha dil se karte ha... ku sahi kha na mene

rawat said...
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